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दुनियाभर में अस्थमा के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. खांसी, सांस लेने में दिक्कत एवं छाती में जकड़न जैसी दिक्कतें अस्थमा के मरीज को खासा परेशान करती हैं.  ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा कंट्रोल (जी. आई. एन. ए) के अनुसार  करीब 300 मिलियन लोगों को अस्थमा है और इस बीमारी के कारण प्रतिदिन विश्व में 1000 रोगियो की मृत्यु होती है। इसके मामले लो और लोअर मिडल इनकम वाले देशों में ज्यादा देखे जाते हैं। लोगों को अस्थमा जैसी गंभीर बीमारी की जानकारी काफी कम होती है। भारत के वरिष्ठ सांस एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ.  आयुष जैन :-

अस्थमा के लक्षण:- वरिष्ठ सांस एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. आयुष जैन के अनुसार अस्थमा का सबसे बड़ा लक्षण खांसी है और अगर किसी को रात में लगातार खांसी रहे तो उसे तुरंत जांच करवानी चाहिए। इसले अलावा  (१) तेज खांसी के साथ सांस लेने में दिक्कत (2) सीने में जकड़न (3) सांस का फूलना (4) सीने में दर्द (5) घबराहट या बेचैनी (6) अक्सर थकान रहना

अस्थमा क्या होता है?:- अस्थमा के होने के पीछे कई कारण होते हैं जिनमें जेनेटिक, वायरल इंफेक्शन, एलर्जी का होना आम है। इसके पेशेंट को एक्सरसाइज, एलर्जी, एनवायरमेंटल समस्याएँ जैसे की प्रदूषण या कुछ खास दवाओं की वजह से अस्थमा का अटैक आ सकता है।

अस्थमा के प्रकार और इलाज:- वरिष्ठ सांस एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. आयुष जैन के अनुसार अस्थमा के भी कई प्रकार होते हैं और इसके इलाज में उम्र व टाइप दोनों का ख्याल रखा जाना चाहिए । नॉन एलर्जिक, ऑक्यूपेशनल, एक्सरसाइज इंड्यूस्ड ब्रोकोकोन्सट्रिक्शन, एस्पिरिन, कफ और नोक्टर्नल अस्थमा के टाइप्स  माने जाते हैं।जिन्हें इंटरमिटेंट अस्थमा होता है उन्हें लक्षण बहुत कम नजर आते हैं और ऐसे पेशेंट हफ्ते या महीने में दो-तीन दिन ही परेशान रहते हैं। माइल्ड अस्थमा के मरीजों को हफ्ते या महीने में चार दिन तक दिक्कत ज्यादा परेशान करती है। इसके अलावा व्यायाम की स्थिति में अस्थमा का अटैक आ सकता है। तुरंत विशेषज्ञ से इलाज करवाना चाहिए।

कारण:-  अस्थमा आमतौर पर अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण फेफड़ों में सूजन की एक आजीवन बीमारी है। फेफड़ों में सूजन में वायुमार्ग के आसपास की मांसपेशियों का कड़ा होना, वायुमार्ग में ऊतकों की सूजन और बलगम का निकलना शामिल है जो वायुमार्ग को अवरुद्ध कर सकता है। जब ऐसा होता है तो सांस लेना मुश्किल हो जाता है और अस्थमा का दौरा पड़ता है ट्रिगर्स में शामिल हो सकते हैं: (1)  पराग, पालतू जानवर, फफूंद, लचट्टे और धूल के कण से एलर्जी की प्रतिक्रिया। (2) सर्दी, फ्लू या नाक, मुंह और गले को प्रभावित करने वाली अन्य बीमारियाँ। (3) तंबाकू का धुआं। (4) ठंडी, शुष्क हवा. (5) व्यायाम (6) गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स रोग (जीईआरडी) नामक एक स्थिति जिसके परिणामस्वरूप पेट का एसिड मुंह और पेट के बीच की नली में प्रवेश कर जाता है। (7) हवा में प्रदूषण या परेशान करने वाले रसायन। (8) दर्द निवारक, जैसे एस्पिरिन और नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी, और कुछ अन्य दवाएं।(9)अवसाद या चिंता. जिस किसी को भी अस्थमा है उसे अस्थमा का दौरा पड़ने का खतरा है। 

जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं (1)अनियंत्रित एलर्जी।(2)पर्यावरण सम्बन्धी ट्रिगर्स (3) नियमित दवा न लेना।(4)इनहेलर का गलत इस्तेमाल.(5)लम्बा अवसाद या चिंता।(6) अन्य दीर्घकालिक बीमारियाँ, जैसे हृदय रोग या मधुमेह।

वरिष्ठ सांस एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. आयुष जैन के अनुसार (1) ट्रिगर्स से बचें।(2)वायु प्रदुषण से बचे (3)संभावित एलर्जी परीक्षण करवाएं और निर्देशानुसार दवाएं लें।(4)स्वछता का ख्याल रखे ।(5)वार्षिक फ्लू शॉट्स और आपके डॉक्टर द्वारा अनुशंसित अन्य टीकाकरणों पर अपडेट रखें।(6)अवसाद, चिंता या संबंधित स्थितियों का उपचार प्राप्त करें।(7) धूम्रपान छोड़ दें।(8) अपनी दवाइयां समय पर नियमित रूप से लें।